बुधवार, 14 नवंबर 2018

श्रीकृष्णशरणापत्तिस्तोत्रम्

श्रीदः श्रीशः श्री निवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः। श्रीधरः श्रीकरः श्रीमान्श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१॥
श्रीवृन्दावनचन्द्रः श्री, – व्रजेन्द्रकुल चन्द्रमाः। श्रीराधा कौमुदीचन्द्रः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ २॥

अनुवाद:- लक्ष्मी को देने वाले, लक्ष्मी के पति, जिनके वक्ष:स्थल पर लक्ष्मी निवास करती हैं, लक्ष्मी के धन अथवा लक्ष्मी है जिनका धन, लक्ष्मी को पालन करने वाले, लक्ष्मी को धारण करने वाले, लक्ष्मी को वृद्धि करने वाले लक्ष्मीवान् भगवान् श्रीकृष्ण ही एक मात्र मेरा आश्रय स्थान हैं ॥१॥ श्रीधाम वृन्दावन के चन्द्रमा,
व्रजराज कुल के चन्द्रमा, श्रीराधारूप चाँदनी के विकास के चन्द्र भगवान् श्रीकृष्ण ही एक मात्र मेरा आश्रय स्थल हैं॥२॥

नवगोपकिशोरेन्द्रः कोटिकन्दर्पसुन्दरः। श्रीराधाकेलिसन्तुष्टः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥३॥
कोटीन्दुजगदानन्दी कालिन्दीपुलिनोत्सवः। स्फुरदिन्दीवरश्यामः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥४॥

नये-नये ग्वालवाल जो किशोर अवस्थावाले हैं उनमें श्रेष्ठ, करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर, ब्रजेश्वरी श्रीराधारानी के प्रेम से सन्तुष्ट भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा अवलम्ब हैं ॥३॥ करोड़ों चन्द्रों के समान जगत को आनन्दित करने वाले, यमुनाजी के तट पर विहार करने वाले, चमकते हुए कमल के समान श्यामस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं।४।।

त्रिभङ्गीललितस्तिर्यक्ग्रीस्त्रैलोक्यमोहनः। पिच्छमौलिः पीतवासाः श्रीकृष्णः शरणं मम॥५॥
मुरलीवादनकलामुह्यस्थावरजङ्गमः। प्रत्यङ्गापारसौन्दर्य: श्रीकृष्णः शरणं मम ॥६॥

अति सुन्दर त्रिभङ्गी रूपवाले, तिरछी ग्रीवा, चितवन से त्रिलोकी को मोहित करने वाले, सिर पर मोर पंख का मुकुट धारण करने वाले पीताम्बरधारी भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं ॥५॥
वंशीध्वनि से समस्त जड चेतन को मोहित करने वाले, जिनके सर्वाङ्ग में अपार सौन्दर्य है वे भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं ॥६॥

कौस्तुभोदारवक्षः श्री, स्फुरन्मकरकुण्डलः । कङ्कणाङ्गदरोचिष्णुः श्रीकृष्णः शरणं मम्॥ ७॥

विस्फुरत्किङ्किणीजालमणिनुपूरमण्डित: । विद्योतपिच्छमुकुटः श्रीकृष्णः शरणं मम॥८ ॥

जिनके उदार वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि है, कानों में मकराकार कुण्डल चमक रहा है और बाहुओं में कङ्कण एवं बाजूवन्द सुशोभित हैं वे भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं॥ ७॥ चमकते हुए घुघरुओं के जाल एवं मणियुक्त नुपूर धारण करने वाले तथा चमकते हुये मोर के पंख का मुकट धारण करने
वाले भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरा एक मात्र आश्रय स्थल हैं। ॥८॥

चन्दनागारलिप्ताङ्गः कस्तूरीतिलकोज्ज्वलः। आजानुतुलसीदामः श्रीकृष्णः शरणं मम॥९॥
कदम्बतरुमूलस्थः कदम्बकृतकर्णिकः। कदम्बमालया वीतः श्रीकृष्णः शरणं मम ।। १०॥

मलयागिरि-चन्दन से सुशोभित अङ्ग वाले, ललाट पटलमें कस्तूरी-तिलक धारण करने वाले और जानुपर्यन्त तुलसी की माला धारण करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थल हैं ॥ ९ ॥
कदम्ब वृक्ष के नीचे विराजमान कदम्ब पुष्पों को कानों में लटकाये हुए और कदम्ब फूलों की माला को गले में धारण करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं॥१०॥

वंशीनादसमाकृष्टो ब्रजसीमन्तिनीव्रतः। राधिकाप्रेमविवश: श्रीकृष्णः शरणं मम ॥११॥
पुलकावचितसर्वाङ्गः समालिङ्गन्मुहुर्मुहुः। रूपलीलानिधिं राधां श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१२॥

बाँसुरी की ध्वनि से ब्रजसुन्दरियोंके समूह को सम्यक् आकृष्ट करने वाले और ब्रजेश्वरी श्रीराधा रानी के प्रेम के आधीन में रहने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं॥ ११ ॥ रूप सौन्दर्य एवं लीला- निधि वृषभान नन्दिनी श्रीराधारानी को बारम्बार सम्यक् आलिङ्गन करते हुए जिनका सारा अङ्ग रोमाञ्चित हो रहा है। वे भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं ॥१२॥

महाकामाग्निसन्तप्तो गोपीगीतसुधाहृदः ।राधासङ्गैकजीवातुः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१३॥
वेणुरन्ध्रचलाङगुल्या भातिरत्नोर्मिका छविः । शिञ्जन्मञ्जीररसनः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१४॥

महाकामाग्नि से सन्तप्त, गोपीगीतामृत के सरोवर स्वरूप और ब्रजेश्वरी श्रीराधारानी के सङ्ग ही जीवनधारण करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा सहारा हैं॥१३॥ वंशीके छिद्रों पर चलने वाली अंगुलियों से रत्नों के तरङ्गकी भाँति सुशोभित हो रही है छवि जिनकी, शब्द करते हुए घुंघरू हैं करघनी में जिनके वे भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय हैं ॥१४॥

सान्द्रानन्दैकचिङ्घने सदा वृन्दावने वने। विरहन् राधया नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१५॥
अत्याश्चर्यानन्तशक्ति अत्याश्चर्यगुणाकरः। अत्याश्चर्यानन्दरसः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१६॥

सघन जो आनन्द और चिद्घन ऐसे वृन्दावन के वन-वन में सदा परा शक्ति श्रीराधाजी के साथ विहार
करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा सहारा हैं ॥ १५ ॥ जो अति आश्चर्य अनन्त अचिन्त्य शक्तिशाली,
अति आश्चर्यमय कल्याण गुणों के महोदधि और अति आश्चर्य आनन्द रस स्वरूप हैं वे भगवान् श्रीकृष्ण ही
एकमात्र मेरे आश्रय स्थान हैं॥१६॥

महाचमत्कारिसर्वनिजशक्तिप्रवर्तकः । कृपौदार्यनिधिः प्राज्ञः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१७॥
अविशेषेण सर्वस्य सर्वकामप्रपूरकः । सर्वसिद्धिप्रदो नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम॥१८॥

अपने सभी भक्तोंमें अपनी महाचमत्कारी शक्ति को देखने वाले अथवा जो अपनी पराशक्ति (राधा)
के सहारे से बडे-बडे चमत्कार पूर्ण लोक विलक्षण, लीलायें करते हैं, जिससे संसार की परम्परा चलती है, जो कृपा एवं उदारता के समुद्र हैं। जो भक्तों का अज्ञान दूर करते हैं और परम हंसों को ज्ञान देते हैं वे भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरा आश्रय स्थान हैं ॥१७॥ जो सबकी सारी कामनाओं को बराबर पूर्ण करते हैं और उनको नित्य सकल सिद्धियाँ प्रदान करते हैं वे भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थान हैं॥१८॥

स्मृतीणां वशयन् विश्वं वर्षन् सर्वार्थसम्पदः । सर्वापद्भ्यः सदा रक्षन् श्रीकृष्णः शरणं मम ॥१९॥
सकृत् तवाहमित्येवं वादिनेऽपि निजात्मदः। अत्यन्तापारकारुण्यः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥२०॥

विश्व को वश में करते हुए अपने स्मरण करने वालों पर धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष का वर्षण करते हुए जो सारी आपत्तियों से हमेशां रक्षा करते हैं वे भगवान् ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थान हैं॥१९॥ जो एक बार भी भगवान् श्रीहरि की शरण में जाकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसे कहनेवाले को भी जो अपना स्वरूप प्रदान करते हैं। वे अत्यन्त अपार करुणा मूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थल हैं॥२०॥

अनन्तापारे संमग्नः कामकेलिरसाम्बुधौ। श्रीराधाप्राणहृदयः श्रीकृष्णः शरणं मम॥२१॥
स्वतन्त्रमेव सकलं कुर्वन्नुद्दामशक्तिमान्। महानन्दमयो देवः श्रीकृष्णः शरणं मम ।।२२।।।

हाव-भाव, महाभाव कृपा-कटाक्ष, क्रीड़ा रस सागर की अपार अनन्त-असंख्य जलराशि में डूबे हुए
श्रीराधा प्राणहृदय भगवान् श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थल हैं ॥२१॥ जो अनन्त अचिन्त्य स्वाभाविक
शक्तिमान् विश्वात्मा विश्वमूर्ति स्वेच्छाधीनदेव चराचर समस्त जगत् की रचना करते हैं वे महानन्दमय श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थल हैं ॥२२॥

स्वपदाम्भोरुहद्वन्द्परमप्रेमभक्तिदः। महानन्दमयो देवः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥२३॥
सर्वमन्यद् विनाप्येकमत्याभासेन सर्वदा। महास्वान्तो दयः स्वामी श्रीकृष्णः शरणं मम ॥२४॥

उपासकों को अपने युगल चरणारविन्दों की प्रेमलक्षणा पराभक्ति प्रदान करने वाले महानन्दमय देव
ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थान हैं॥ २३॥ दूसरे के बिना एक ही जो सब चराचर वस्तु रुप से सदा – सर्वदा आभासित होने वाले अर्थात् एक ही जो प्रपञ्चरूप में भासित हो रहे हैं एवं महती दया युक्त अन्त:करणवाले वे स्वामी श्रीकृष्ण ही एकमात्र मेरे आश्रय स्थान हैं ॥२४॥

श्रीकृष्णशरणापत्ति स्तोत्रमेतन्निरन्तरम्। यः पठेत् तस्य सर्वार्थाः सिद्धयन्ति साधनैर्विना॥२५॥

इस श्रीकृष्णशरणापत्तिस्तोत्र का जो नियम से प्रतिदिन पाठ करता है उसके समस्त अर्थ (प्रयोजन
=कार्य) बिना साधनों से सिद्ध हो जाते हैं ॥२५॥

इति श्रीमन्निम्बार्कीय वैष्णवाचार्यजगद्विजयी- केशवकाश्मीरिभट्टचरणारविन्दचञ्चरीक
श्रीश्रीभट्टप्रणीतं श्रीकृष्णशरणापत्ति स्तोत्रंसम्पूर्णम् ।

इस प्रकार श्रीनिम्बार्कीय वैष्णवाचार्य जगद्विजयी श्रीकेशव काश्मीरिभट्टजी के शिष्य श्रीश्रीभट्टदेवाचार्य जी कृत।
श्रीकृष्णशरणापत्तिस्तोत्र का अनुवाद समाप्त हुआ।

अनुवादक डॉ० स्वामी द्वारकादास जी काठियाबाबा


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