भगवान् श्रीनिम्बार्काचार्य का आविर्भाव समय

॥ श्रीराधासर्वेश्वरो विजयते ॥
भगवान् श्रीनिम्बार्काचार्य का आविर्भाव कब हुआ? इस सम्बन्ध में विभिन्न-विभिन्न लेखकों ने अपने-अपने विभिन्न अभिमत व्यक्त किये हैं। उन सबका वर्गीकरण किया जाय तो तीन मत स्थिर होते हैं। पहला द्वापर का अन्त और कलियुग का आरम्भ, दूसरा विक्रम की ग्यारहवीं बारहवीं शताब्दी, और तीसरा शंकराचार्य से पूर्व पांचवीं छठी शताब्दी। । पहला अभिमत संस्कृत के वामन-भविष्य आदि पुराण और औदुम्बर संहिता, रावण संहिता, भृगु संहिता आदि धर्मशास्त्रीय एवं ज्योतिष ग्रन्थों के आधार पर है। दूसरा डाक्टर भाण्डारकर आदि के अनुमानों पर और तीसरा आधुनिक अन्वेषकों के शोध पर आधारित है। इन तीनों में कौन सा- ठीक है, इस जिज्ञासा के समाधानार्थ यहां तीनों अभिमतों के हेतुओं का उल्लेख कर देना उचित है। जिससे आलोचकों का मार्ग दर्शन हो सके।

संस्कृत ग्रन्थों में श्रीनारायणशरणदेवाचार्यजी द्वारा एक आचार्यचरित्र ग्रन्थ संकलित किया हुआ है, उसके चार विश्रामों में श्रीनिम्बार्काचार्य का आविर्भाव समय निर्धारित किया गया है।

जब धर्म का ह्रास और अधर्म की अभिवृद्धि होती है तभी भगवान् अवतीर्ण होते हैं। कपिल, हंस, सनकादि, नारद ऋषभ, पृथु, व्यास नरनारायण, दत्तात्रेय एवं सुदर्शन ये सब अवतार धर्म रक्षणार्थ हुए थे। आत्मज्ञान के लिये स्वयं हरि (नारायण) ने हंसावतार धारण किया था। श्रीमद्भागवत में इनका उल्लेख इस प्रकार मिलता है--

हंसस्वरूपवदच्युत आत्मयोगं, • दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः ।

विष्णुः शिवाय जगतां इतिशास्त्रमानात्, नारायणो रुचिर हंसवपुर्बभूव ।।

(भा०११/४/१७) हंस रूप से अवतीर्ण होकर भगवान् ने सनकादिकों को आत्मयोग का उपदेश दिया। सनकादिकों के सम्बन्ध में यही कहा गया है--ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना के लिये तप किया, तब सर्वप्रथम सनकादिकों का आविर्भाव हुआ। पूर्वकल्प में विलुप्त आत्मज्ञान उनके द्वारा फिर से प्रकटित हुआ--

तप्तं तपो विविधलोक सिसृक्षया में, आदौ सनात्स्वतपसा स चतुःसनोऽभूत।

प्राक्कल्पसंप्लवविनष्टमिहात्म तत्वं, सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ।।

(भा० २/७/५) भागवत के प्रथम स्कन्ध में भी ऐसी ही चर्चा है, सनकादिकों का प्रादुर्भाव सबसे पहले हुआ--

कार्तिके शुक्लपक्षे वै नवम्यां शुभवासरे। ब्रह्मणो मनसो जाताश्चत्वारः सनकादयः ।।

(भा० १/३/६) सनकादिकों को आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिये ही भगवान् ने हंसावतार धारण किया था। “यही योग मैंने अपने शिष्य सनकादिकों को बतलाया था भगवान् के मुख से यह सुनकर उद्धवजी ने कहा--प्रभो ! अपने सनकादिकों को जिस योग का उपदेश दिया उसे में विशद रूप से जानना चाहता हूँ। भगवान् ने कहा-हे उद्धव ! ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनकादिकों ने उनसे पूछा--त्रिगुणात्मचित्त त्रिगुणात्मक विषयों से पृथक् कैसे हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर ब्रह्माजी नहीं दे सके, उन्होंने प्रभु

का ध्यान किया, उसी क्षण हंसावतार हुआ, सनकादिकों ने पूछा-आप कौन हैं ? हंस भगवान् बोले-आप आत्मा के सम्बन्ध में पूछते हैं या देह के सम्बन्ध में, दोनों ही प्रकार से प्रश्न नहीं बनता, क्योंकि देह सभी के भौतिक हैं ही, आत्मा भी सब चित्स्वरूप अतएव समान हैं। जो आप हैं। वही हम हैं, पूछना व्यर्थ । जब सनकादिक कुछ लज्जित दिखाई दिये तब भगवान् ने कहा, तुम्हारा यह प्रश्न ठीक है--दोनों के त्रिगुणात्मक होने के कारण चित्त का विषयों से पार्थक्य कैसे हो ? उसका समाधान यही हैचित्त और विषय दोनों मुझे अर्पित कर दिये जायें, हे उद्धव ! यही उपदेश मैंने हंसावतार धारण करके सनकादिकों को दिया था--

गुणेष्वाविशञ्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया। गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥

(भाग० ११/१३) सनकादिकों को गोपाल अष्टादशाक्षर मन्त्र देकर हंस भगवान् अन्तर्हित हो गये। विष्णु यामल ग्रन्थ में गोपाल अष्टादशाक्षर मन्त्र की ऐसी परम्परा मिलती है--

नारायण मुखाम्भोजान्मन्त्रस्त्वष्टादशाक्षरः । आविर्भूतः कुमारैस्तु गृहीत्वा नारदाय च ।।

सनकादिकों से नारदजी के ब्रह्मविद्या प्राप्त करने का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद् के सातवें अध्याय के २६ खण्डों में मिलता है। भगवान् श्रीनिम्बार्काचार्य ने वेदान्त सूत्रों पर स्वरचित वेदान्त पारिजात सौरभवृत्ति में लिखा है--

परमाचार्यैः श्रीकुमारैरस्मद्गुरवे श्रीमन्नारदायोपदिष्टो भूमात्वेव विजिज्ञासितव्यः। ।

(वेदान्तसूत्र १/३/८ की वृत्तिः ) श्रीनिम्बार्क कृत दशश्लोकी (वेदान्त कामधेनु) के विवरणकार श्रीपुरुषोत्तमाचार्यजी ने भी छठे श्लोक के--“सनन्दनायै-मुनिभिस्तथोक्तं श्रीनारदायाऽखिलतत्वसाक्षिणे।” इस उत्तरार्द्ध के अन्तिम पद की व्याख्या में लिखा है--“श्रीनारदाय इति अस्मद्गुरवे इत्यर्थः। तेनैव मह्यं यदुपदिष्टं तदेवात्रोक्तं मयापीति शेषः। श्रीगुरुं विशिनष्टिः-अखिल तत्व साक्षिणे इति। सर्वतत्व विषयक प्रत्यक्षानुभवाश्रयभूताय सर्वज्ञाय इति।।

श्रीनिवासाचार्यजी ने वेदान्त सूत्रों पर स्वरचित वेदान्त कौस्तुभ भाष्य के आरम्भिक-मंगलाचरण में भी श्रीहंस सनकादिक, श्रीनारद और श्रीनिम्बार्क इन चारों की वन्दना करके अपनी गुरु परम्परा का परिचय दिया है-- | श्रीहंस सनकादीन् देवर्षि निम्बभाष्करञ्च भजे।।

कृपयैषां श्रीकृष्णेपरमात्मनि नो भवतु भक्तिः ।।

श्रीनिम्बार्काचार्य श्रीसुदर्शन चक्रराज के अवतार हैं। नारद पञ्चरात्र में कहा है, शंख साक्षात् वासुदेव है, गदा संकर्षण रूप है, पद्म प्रद्युम्न और सुदर्शन अनिरुद्ध स्वरूप हैं-इस प्रकार ये चारों आयुध चतुयूंह रूप

'शंखः साक्षाद्वासुदेवो गदा संकर्षणः स्वयम् । वभूव पद्म प्रद्युम्नोऽनिरुद्धस्तु सुदर्शनः ।। नैमिष खण्ड में श्रीसुदर्शन का त्रेतायुग में हविर्धान रूप से अवतार हुआ था--

हविर्षि धारयन् पुष्णन् हविर्धान इतीर्यते । वेदानानन्दयेद्यस्मान्नियमानन्द ईय॑ते ।।

हवि को धारण करने से हविर्धान नाम हुआ, फिर द्वापरान्त में समस्त वेदों का समान रूप से समर्थन कर उन्हें आनन्दित करने से नियमानन्द नाम हुआ।

औदुम्बराचार्य ने भी लिखा है--प्रथम युग में कभी गोवर्धन के निकट निम्बग्राम में जगन्नाथजी की धर्मपत्नी श्रीसरस्वतीदेवजी एवं जयन्ती के उदर से वैशाख शुक्ल ३ को भी साक्षात् सुदर्शन निम्बादित्य नाम से अवतीर्ण हुए थे।

गोवर्धन समीपेतु निम्बग्रामे द्विजोत्तमः। जगन्नाथस्यपल्यां वै जयन्त्यां प्रथमे युगे ।।

वैशाखे शुद्धपक्षे च तृतीयायां तिथौ पुनः।। साक्षात्सुदर्शनोलोके निम्बादित्यो बभूवह ।।

नैमिषखण्ड में लिखा है कि श्रीनारदजी ने विप्रपालक सुदर्शनजी को वेदों का सार उद्धृत करके अपनी वाणी से ग्रहण कराया था।

आम्नायरसमुद्धृत्य विंप्रपालं सुदर्शनम् । स्वया भाषा ग्रहासन्नं ग्राहयामास नारदः ।।

कांची खंड में-ऐसे ही अभिप्राय का वाक्य मिलता हैवीणापाणेगुरोर्लब्ध्वा मोक्षोपायं सुदर्शनः । वेदान्तवेद्य सद्धर्मं समग्रहौ च सर्वशः ।।

श्रीनिम्बार्काचार्य ने तपश्चर्या करते समय केवल निम्बक्वाथ का ही अशन किया था, ऐसा सम्मोहन तन्त्र में कहा गया है--

हविर्द्धनाभिधानस्तु चक्रमासीन्महामुनिः। सोऽतप्यत तपस्तीनं निम्बाथैक भोजनः ।।

उन्होंने दो बीज और लगाकर (अष्टादशाक्षर मन्त्र का) बीस अक्षरों का स्वरूप बनाकर श्रीवृन्दावन की माधवी लताओं के मण्डप में बैठकर जप किया था।

आशु सिद्धिकरं मन्त्रं विंशत्यर्णञ्च जप्तवान् । अनन्तरं मारवीजाद्यग्नारूढं तदेव तु । दध्यौ वृन्दावने रम्ये माधवी मंडपे प्रभूः ।।

भविष्य पुराण में लिखा है--पुरुषार्थों (धर्म अर्थ काम मोक्षों) की वर्षा करने एवं श्रीयुगलकिशोर की स्वयं सेवा करने तथा मोक्ष रूपी पुरुषार्थ (पराभक्ति) के कारण ही इनका नाम निम्बार्क प्रसिद्ध हुआ --

पुरुषार्थ प्रवर्षित्वात्सेवांगी कृतया स्वयम्।।

कर्मणा मोक्ष रूपेण निम्बार्क इति विश्रुतः ।। | कृष्णोपनिषत् की “गोप्यो गाव ऋचस्तस्य' इस ऋचा में श्रीनिम्बार्क के आठ स्वरूपों की झलक मिलती है। वामन पुराण में कहा कि-बदरिकाश्रम के कर्णक क्षेत्र (कर्ण प्रयाग) ऐरावती के तट पर भी किसी कल्प में श्रीसुदर्शन का अवतार हुआ था--

कर्णकस्य शुभे क्षेत्रे वदर्याश्रम मंडले। ऐरावत्यां क्वचिज्जातः प्राक्कल्प इति मे श्रुतम् ।।

इस प्रकार वामन, भविष्य पुराण, काँची खंड, नैमिष खंड और औदुम्बर संहिता आदि ग्रन्थों के वाक्यों के आधार से श्रीनिम्बार्काचार्य चरित्र से संग्रहीत किया गया है जो आचार्य चरित्र के नाम से ख्यात है।

चतुर्वर्ग चिन्तामणिकार पं० श्रीहेमाद्री ने भविष्य पुराण का एक और श्लोक अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है, वह हेमाद्री के व्रत खण्ड में इस प्रकार मिलता है--

उदय व्यापिनी ग्राह्या कुले तिथिरुपोषणे । | निम्बार्को भगवान्येषा वाञ्छितार्थ प्रदायकः ।।

(हेमाद्री व्रत खण्ड) धर्मशास्त्रों में व्रतों की तिथियों की शुद्धि पर विशद विचार किया गया है। प्रायः तिथियाँ दो प्रकार की होती हैं-शुद्धा और विद्धा, शुद्ध तिथि वह कहलाती है जिसमें पूर्व तिथि का सम्पर्क न हो, जिसमें पूर्वापर तिथियों का सम्पर्क हो वह विद्धा कहलाती है। विद्धा तिथि भी दो प्रकार की होती हैं, एक पूर्व विद्धा, दूसरी पर विद्धा, वैष्णव धर्म शास्त्रकारों ने पूर्व विद्धा तिथि को त्यागने का आदेश दिया है, और उसे वैष्णवों का लक्षण (स्वरूप) माना है--

पूर्वविद्धातिथित्यागो वैष्णवस्य हि लक्षणम् ।।

हेमाद्री ने जो श्लोक उद्धृत किया है वह किसी निम्बार्कीय व्यक्ति का रचा हुआ नहीं है अपितु श्रीवेदव्यासजी की उक्ति है। उसका तात्पर्य है--जिस सम्प्रदाय में भगवान् श्रीनिम्बार्क वाञ्छित फल दाता (उपास्य) हों उस सम्प्रदाय में व्रत उपवास आदि धर्म कार्यों में उदय व्यापिनी तिथि का ग्रहण करना चाहिये। उदय व्यापिनी का तात्पर्य है--तिथि का उदय, वह अर्धरात्रि के अनन्तर होता है। उदाहरण-१० मी तिथि यदि अर्धरात्रि के अनन्तर एक पल भी हो तो दूसरे दिन आने वाली एकादशी तिथि विद्धा कहलाती है। इसी का नाम अर्द्धरात्रवेध एवं कपालवेध है। यह वेध श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय में ही अंगीकृत है, अन्य वैष्णव सम्प्रदाय में यह नहीं अपनाया गया है।

हेमाद्री द्वारा उल्लिखित यह श्लोक भट्टोजी दीक्षित ने स्वरचित तिथि निर्णय में और कमलाकर भट्ट ने स्वरचित निर्णयसिन्धु में उद्धृत किया है। सम्भव है दाक्षिणात्य कमलाकरभट्ट उत्तर भारत के अनेकों प्रदेशों में व्याप्त श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय से अनभिज्ञ रहे हों, अतः उन्होंने उपर्युक्त श्लोक को (जन्माष्टमी प्रकरण में) उद्धृत करके अन्त में लिख डाला-इदानीं निम्बा-दित्योपासनायाः क्वाप्यभावात्।।

सुदूर दक्षिण प्रदेश के हैदराबाद से पूर्व ६ मील की दूरी पर बसे हुए नगर ‘अदिलाबाद में उपलब्ध विक्रम की बाहरवी शताब्दी के श्रीनिम्बादित्य प्रासाद का शिलालेख भी इस बात को प्रमाणित एवं पुष्ट करता है कि विक्रम की ११ वी १२ वीं शताब्दी में श्रीनिम्बार्काचार्य की जहाँ तहाँ प्रतिमायें पूजी जाती थीं। कई एक ठिकानों पर उनके मन्दिर बने हुये थे। | इन सब प्रमाणों के अनुसार निम्बार्क भगवान् का आविर्भाव काल द्वापर के अन्त और कलियुग का आरम्भ ठहरता है। भृगु संहिता में जो श्रीनिम्बार्काचार्य की जन्म कुण्डली मिलती है, उसमें कलि अब्द १५ लिखा है। | इधर आधुनिक आलोचकों में सर्व प्रथम डा० आर० जी० भाण्डारकर ने अपनी शैविज्म वैष्णव विज्म में लिखा है-श्रीनिम्बार्काचार्य का आविर्भाव काल निश्चित करना कठिन है-आगे चलकर उन्हें दो गुरु परम्पराएँ मिलीं उनमें एक परम्परा श्रीहरिव्यासदेवाचार्य के शिष्य दामोदर गोस्वामी तक थी। दामोदर गोस्वामी श्रीनिम्बार्काचार्य से तैंतीसवीं संख्या में है। भाण्डारकर ने लिखा है कि दामोदर गोस्वामी विक्रम संवत् १८०६ (ई० सन् १७५०) में विद्यमान था। मध्वाचार्य की ३३ पीढियां ६०३ वर्षों में हुई हैं, उसी के अनुसार निम्बार्क सम्प्रदाय के आचार्यों के काल का भी औसत लगाया जाय तो विक्रम सं० १२०३ निम्बार्काचार्य का समय निकलता है (प्रत्येक पीठिका का १८ वर्ष औसत लगाया गया है) इस प्रकार उन्होंने मध्वाचार्य से कुछ पूर्व और रामानुजाचार्य से कुछ पश्चात् श्रीनिम्बार्काचार्य के समय का अनुमान लगाया था। भाण्डारकर के पश्चात् कई एक लेखकों ने भाण्डारकर का ही अनुसरण करके इसी के लगभग निम्बार्काचार्य का समय लिखना आरम्भ कर दिया।

स्वामी प्रज्ञानन्द सरस्वती ने अपने वैष्णवदर्शनेर इतिहास में, डा० राजेन्द्रनाथ घोष ने भी इन्हीं का समर्थन किया है। अक्षयकुमार दत्त ने भारतवर्षीय उपासक सम्प्रदाय नाम ग्रन्थ में, जाह्नवीचरण भौमिक एल.एल.बी. ने-संस्कृत साहित्येर इतिहास में, पुलिनविहारी भट्टाचार्य एम. ए. ने श्रीनिम्बार्काचार्य और ताहार धर्ममत में, सुशीलकुमार दे एम.ए.डी.लिटू ने जयदेव और गीतगोविन्देर आलोचना ग्रन्थ में तथा पं० श्रीविन्ध्येश्वरीप्रसादजी द्विवेदी ने “निम्बार्क भाष्य की भूमिका में श्रीभाण्डारकर का ही अनुसरण किया है। डाक्टर राजेन्द्रलाल मित्रा ने तो श्रीवल्लभाचार्यजी से भी श्रीनिम्बार्काचार्य को परवर्ती लिख डाला है। उन्हीं का उद्धरण लेकर डा० श्रीरमा चौधरी कलकत्ता ने डा० औफेक्ट के कैटलोस् कैरलौगरम्” में निम्बादित्य नाम के प्रसंग में किसी फ्रांटियर के पुस्तकालय में मिले एक पत्र में “मध्वमुख मर्दन' नामक पुस्तक का नाम देखकर मध्वाचार्य से भी निम्बार्क को परवर्ती होने का सन्देह प्रकट किया है। उन्होंने “वेदान्त पारिजात सौरभ" का अंग्रेजी अनुवाद किया है। और निम्बार्क सम्प्रदाय के सम्बन्ध में एक शोध-प्रबन्ध लिखकर डाक्टरेट उपाधि प्राप्त की है। किन्तु कई स्थलों पर उसमें उन्होंने भूलें की हैं। बहुत से ग्रन्थों के रचयिताओं के नामों में भी उन्हें भ्रम हुआ है जिससे अन्य रचयिता के ग्रन्थ को वे अन्य रचयिता का मान बैठी हैं।

उपुर्यक्त जिन-जिन बंगाली लेखकों ने डा० भाण्डारकर के अनुमान का अनुसरण किया है उन्होंने अपने अभिमत स्थापना के लिये दलीलें भी बड़ी विचित्र-विचित्र दी हैं, उदाहरणार्थ-पुलिनविहारी भट्टाचार्य कृत 'श्रीनिम्बार्काचार्य और ताहार धर्ममत' को ही ले लिया जाय, उसके पृ० ५२ में श्रीभट्टाचार्यजी लिखते हैं--मुसलमानों के आक्रमण के समय जब सभी हिन्दुओं ने कातर स्वर में मां-मां पुकार की, उसी समय शक्तिवाद का आविर्भाव हुआ। श्रीनिम्बार्काचार्य ने ब्र० सू० अ० २ पाद २ सूत्र ४२ के भाष्य में शक्तिकारणवाद का खण्डन किया है। साथ ही पृ० १०९ पर उन्होंने केनेडी साहब के मतानुसार राधिका शब्द के आविर्भाव का भी। समय ११वीं शताब्दी मानकर राधिका उपासक श्रीनिम्बार्क का भी समय ११ वीं शताब्दी निश्चित किया है।

वास्तव में श्रीभट्टाचार्य का यह महान् भ्रम है क्योंकि शक्तिवाद उतना ही पुराना है जितना सनातन धर्म । शाक्त, शैव, गाणपत्य, सौर और वैष्णव ये पांचों ही सनातन धर्म के अङ्ग हैं। पुरातत्व संग्रहालयों में सुरक्षित दो दो हजार वर्ष पूर्व की सिंहवाहिनी महिषासुरमर्दिनी आदि शक्ति की मूर्तियां विद्यमान हैं तब शक्तिवाद का आविर्भाव ११ वीं शताब्दी कैसे सिद्ध हो सकता है। देवी भागवत को किसी भी आलोचक ने ११ वीं शताब्दी का नहीं माना है, वह शक्ति उपासना को ११ वीं शताब्दी से पर्याप्त प्राचीन सिद्ध करता है। इसी प्रकार ‘राधा' शब्द का आविर्भाव ११ वीं शताब्दी मानना भी नितान्त भूल है, राधा नाम का उल्लेख पञ्चम शताब्दी के पञ्चतन्त्र ग्रन्थ में मिलता है, प्रथम शताब्दी की गाथा सप्तशती में भी है। इस सम्बन्ध में बंकिमबाबू कृत श्रीकृष्ण चरित्र द्वितीय खण्ड का दशवां परिच्छेद द्रष्टव्य है। उसके अतिरिक्त श्रीबल्देव उपाध्याय कृत भारतीय वाङ्गमय में श्रीराधा, डा० द्वारकाप्रसाद मीतल का राधा विषयक शोध प्रबन्ध आदि ग्रन्थ अवलोकनीय हैं।

इससे डा० श्रीसुशीलकुमार दे का यह अनुमान भी ध्वस्त हो जाता है कि रागमूलक उपासना वाले निम्बार्क रागमूलक उपासक जयदेव के समकालीन हुए होंगे। वास्तव में दे साहब को श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के ऐतिह्य का ज्ञान नहीं रहा है। जयदेव के समसामयिक तो श्रीकेशवकाश्मीरिभट्टाचार्य थे जो श्रीनिम्बार्काचार्य के पश्चात् २९ वीं पीठिका में गिने जाते हैं।

श्रीविन्ध्येश्वरीप्रसादजी ने श्रीनिम्बार्क भाष्य की भूमिका में जोविष्णुस्वामी प्रथमतो, निम्बादित्यो द्वितीयतः। मध्वाचार्य स्तृतीयस्तु, तुय्यरामानुजः स्मृतः ।।

(भविष्यपुराण परिशिष्ट २१ वां अध्याय भगवद्भक्त माहात्म्यं प्रसंग) उद्धरण देकर विष्णुस्वामी (उन्हीं के मत से वि० सं० ११९९ कालीन) से श्रीनिम्बार्क को परवर्ती होने का अनुमान लगाया है वह भी ठीक नहीं प्रतीत होता क्योंकि उपर्युक्त श्लोक किसी आचार्य की पूर्वापरता सिद्ध नहीं करता। अन्यथा रामानुजाचार्य को भी इस श्लोक के अनुसार श्रीमध्वाचार्य से परवर्ती मानना होगा। किन्तु श्रीरामानुज को सभी लेखक श्रीमध्वाचार्य से पूर्ववर्ती ही लिखते हैं। अतः द्विवेदीजी का अनुमान असंगत ही सिद्ध होता है।

श्रीसुधीवर हरवदनराय ने श्रीकर भाष्य की भूमिका (अंग्रेजी) के पृ० १३५ में श्रीरामानुज ई० सन् ११३८ और श्रीकर ई० सन् १२६० का मध्यकाल श्रीनिम्बार्क का समय लिखा है। आगे चलकर उसी भूमिका के पृ० २११ पर उन्होंने श्रीनिम्बार्क को श्रीमध्वाचार्य (ई० सन् १२३८) से परवर्ती लिख दिया है। यह भी पूर्वापर विरुद्ध है।

सत्येन्द्रनाथ वसु एम.ए.बी.एल. ने बंगला सन् १३४२ ज्येष्ठ मास की वसुमती (बंगला पत्रिका) में वैष्णवमत विवेक शीर्षक एक लेख लिखा था, उसमें उन्होंने यह तर्क दिया था कि-यदि श्रीनिम्बार्क शंकर से पूर्ववर्ती होते तो शंकराचार्य स्वरचित भाष्य में निम्बार्क के द्वैताद्वैत मत की आलोचना अवश्य करते। दूसरा तर्क उन्होंने यह भी दिया है कि शंकर दिग्विजय में भी निम्बार्क एवं उनके मत का उल्लेख नहीं।

वसुजी का यह तर्क भी केवल अपलाप मात्र है, भाष्यों की तुलना करते तो उन्हें ज्ञात होता। ब्रह्मसूत्र २/१/१४ के शंकर भाष्य में, भेदाभेद की आलोचना स्पष्ट है। वृहदारण्यक उपनिषत् ५/१ भाष्य में श्रीशंकराचार्य ने विशद् रूप से द्वैताद्वैत की आलोचना की है। कुछ सज्जनों का कहना है कि शंकराचार्य ने वह आलोचना भर्तृप्रपंच के मत की की होगी। परन्तु भृर्तप्रपंच का आज कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता, वास्तव में ब्र० स० २/१/१४ के शंकर भाष्य का “नन्वेनेकात्मकं ब्रह्म०' यहां से आरम्भ करके “उभयसत्यतायां हि कथमेकत्व ज्ञानेन नानात्वज्ञानमपनुद्यत इत्युच्यते। यह सन्दर्भ ब्र० सू० २/१/१३ के श्रीनिम्बार्क शिष्य श्रीनिवासकृत वेदान्तकौस्तुभ के--“वृक्षोपादानकानां फलपत्रादीनाञ्च कारणाऽनन्यत्वेऽपि विभागोऽस्ति' इत्यादि सन्दर्भ की स्पष्ट आलोचना परक दिखाई देता है। वह अर्थतः ही नहीं शब्दतः भी मेल रखता है।

विद्यारण्यकृत शंकर दिग्विजय अथवा सर्वदर्शन संग्रह में श्रीनिम्बार्क और उनके दर्शन का उल्लेख न होने से विद्यारण्य और सर्वदर्शन संग्रह के रचनाकाल से श्रीनिम्बार्क को अर्वाचीन मानना भी विचार विहीन ही कहा जायेगा। क्योंकि यह ग्रन्थकार की इच्छा पर निर्भर है, वह चाहे जिसका उल्लेख करे चाहे न करे। इस उदाहरण के अनुसार तो यह भी कह सकते हैं कि “श्रीनिम्बार्काचार्य हेमचन्द चौधुरी (विक्रम की २० वीं शताब्दी) से भी परवर्ती होंगे क्योंकि हेमचन्द्र चौधुरी ने स्वलिखित “वैष्णव सम्प्रदायेर इतिहास' नामक पुस्तक में श्रीनिम्बार्क का नामोल्लेख नहीं किया। किन्तु इसे कोई भी विचारशील व्यक्ति नहीं मान सकता किनिम्बार्काचार्य हेमचन्द्र चौधुरी से भी अर्वाचीन होंगे।

सर्वदर्शन संग्रहकार ने भट्टभाष्कर के औपाधिक भेदाभेद का उल्लेख क्यों नहीं किया, भट्टभाष्कर सर्वदर्शन संग्रहकार से पूर्ववर्ती हैं, वे शंकराचार्य के थोड़े ही समय बाद हुए थे। उन्होंने शंकर मत के खण्डनार्थ ही वेदान्त सूत्रों पर टीका लिखी थी। यदि कोई यह कहे कि सर्वदर्शन संग्रहकार भट्टभाष्कर से अपरिचित थे तो यह भी संगत नहीं कहा जा सकता, कारण सर्वदर्शन संग्रहकार भट्टभाष्कर से अपरिचित होते तो वे प्रमेय विवरण संग्रह की टीका में भट्टभाष्कर की चर्चा कैसे करते! यह भी नहीं कह सकते कि श्रीनिम्बार्क का प्रचार-प्रसार उत्तर भारत में रहने के कारण दक्षिण देशवर्ती सर्वदर्शन संग्रहकार उनके मत से अपरिचित रहे हों-उत्तर भारत में भी सुदूर काश्मीर देश में प्रचारित “प्रत्यभिज्ञा दर्शन से सुपरिचित माधवाचार्य मध्यवर्ती व्रज प्रदेश में सुप्रसिद्ध श्रीनिम्बार्क मत से अपरिचित नहीं रह सकते थे। अतः सर्वदर्शन संग्रहकार द्वारा स्वाभाविक भेदाभेद एवं औपाधिक भेदाभेद दर्शन का उल्लेख न करने का कोई और ही कारण हो सकता है। इससे यह नहीं सिद्ध होता कि श्रीनिम्बार्क या उनका सिद्धान्त सर्वदर्शन संग्रहकार से परवर्ती हैं।

डा० रमा चौधरी को यद्यपि निम्बार्क भाष्य पर अनुसन्धान करने से ही डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई है तथापि उन्होंने घर में बैठकर केवल इधर-उधर की पुस्तकों को देख करके ही वह कार्य किया, सम्प्रदाय के किसी विशिष्ट विद्वान् से उनका सम्पर्क नहीं हो सका, अन्यथा वे 'वेदान्तकारिकावलि' को श्रीनिवासकृत और सविशेष निर्विशेष श्रीकृष्ण स्तवराज को निम्बार्ककृत मानकर उन्हें शंकराचार्य से परवर्ती नहीं मानती। इसी प्रकार मध्वमुखमर्दन ग्रन्थ को निम्बार्क का मानकर उन्हें मध्व से परवर्ती लिखने का साहस न करती।

इस सम्प्रदाय में एक-एक नाम के कई व्यक्ति हुए हैं, श्रीनिवास भी २-३ हुए हैं और पुरुषोत्तमप्रसाद भी ३-४ हुए हैं। उननका समय भिन्नभिन्न और कृतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं। श्रीकृष्ण स्तवराज की तीन टीकाएँ हैं। उनमें श्रुत्यन्त सुरद्रम टीकाकार पुरुषोत्तमप्रसाद भिन्न हैं, श्रुत्यन्त कल्प वाली टीका के लेखक पुरुषोत्तम और वादिभूषण ग्रन्थ के लेखक पुरुषोत्तम भिन्न-भिन्न हैं। वेदान्त रत्नमंजूषाकार पुरुषोत्तमाचार्य भिन्न हैं। | मध्वमुखमर्दन ग्रन्थ श्रीनिम्बार्क का क्या किसी भी निम्बार्कीय विद्वान् की कृति नहीं है। अप्यय दीक्षित ने अवश्य मध्वमुखमर्दन ग्रन्थ लिखा है। अतः रमाबोस ने किसी तथ्य का शोध न करके उल्टी भ्रान्ति फैला दी है।

डा० भाण्डारकर आदिको आलोचना “भारतेर साधना (बंगला मासिक पत्रिका) बंगला सन् १३४० आग्रहायन मास के अंक में तथा हिन्दी एवं बंगला सुदर्शन पत्र में श्रीनृसिंहदास वसु ने की थी वह मार्मिक है। इसी प्रकार बंगला मासिक पत्रिका “भारती वर्ष ४ अंक ५-६-८९-१० और ११ में श्रीविरजा-कान्त घोष ने विशद् ऊहापोह किया है, उन्होंने श्रीनिम्बार्क और श्रीनिवास के वेदान्त भाष्यों का अध्ययन करके उनका रचनाकाल ईसा की छठी शताब्दी स्थिर किया है।

श्रीबल्देव उपाध्याय ने कई ग्रन्थ लिखे हैं। पहले वे श्रीनिम्बार्क के समय के सम्बन्ध में डा० भाण्डारकर के मत से ही सहमत थे। इस सम्बन्ध में उनसे जब पत्र व्यवहार हुआ तो उन्होंने अपने पत्र में कई तर्क लिखे उनमें एक श्रीकेशवकाश्मीरि भट्टाचार्य और श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का समागम वाला तर्क भी था, सम्भव है उपाध्यायजी ने ऐसा सुना ही होगा। चैतन्य चरितामृत में कविराज कृष्णदासजी के लेख को देखा न होगा। उनका पत्र आते ही हमने अपने यहाँ के पुस्तकालय में सुरक्षित कविराज कृष्णदास कृत चैतन्य चरितामृत (सम्वत् १८९० में नागराक्षरों में लिखित) का पाठ करना आरम्भ किया, किन्तु कहीं भी केशवकाश्मीरिभट्टाचार्य की चर्चा नहीं मिली। केवल दिग्विजयी पराभव प्रकरण में केवल-ऐलो इक दिग्विजयी' मात्र मिला। हमने उन्हें पत्र लिखा, कहीं आपने चैतन्य चरितामृत में देखा हो तो वह प्रकरण लिखने की कृपा करें। जिसमें केशवकामीरिभट्टाचार्य और चैतन्य महाप्रभु के मिलन की चर्चा हो।

उपाध्यायजी ने भी पूरा चैतन्य चरितामृत देखा किन्तु उसमें कहीं हो तब तो मिलता। आखिर उन्हें 6 सितम्बर सन् १९५१ ई० के पत्र में लिखना पड़ा कि-“आपके प्रमाणों से मैंने निम्बार्क मत को वैष्णव सम्प्रदायों में प्राचीनतम मान लिया है। श्रीउपाध्यायजी ने सन् ५१ के पूर्व भारतीय दर्शन आदि जो पुस्तकें लिखीं थीं उनमें श्रीनिम्बार्क को रामानुज के परवर्ती और उनके भाष्य पर रामानुज भाष्य की छाया लिख डाला था। किन्तु उहापोह के पश्चात् उन्होंने भागवत धर्म (पृ० ) में यही लिखा कि वैष्णव सम्प्रदायों में निम्बार्क मत प्राचीनतम मत है। | श्रीसुदर्शनसिंहजी चक्र अच्छे विद्वान् लेखक हैं, ब्रह्मचारी श्रीदकुमारशरणजी ने उनसे कुछ लिखवाया था-चक्रजी ने एक स्थल पर बड़े मजे की बात लिख डाली-शङ्कर भाष्य में भेदाभेद की आलोचना मिलने से निम्बार्क शङ्कर से प्राचीन सिद्ध नहीं होते क्योंकि निम्बार्क का सिद्धान्त तो द्वैताद्वैत है, शंकराचार्य ने कहीं भी द्वैताद्वैत का उल्लेख नहीं किया। श्रीचक्रजी ने यह भी नहीं सोचा “द्वैताद्वैत और भेदाभेद एकार्थक पर्यायवाची हैं-या विभिन्नार्थक। चक्रजी ने ऐसा चक्र चलाकर अपनी योग्यता सूचित की, द्वैताद्वैत और भेदाभेद दोनों ही शब्दों का प्रयोग श्रीनिम्बार्काचार्य, श्रीनिवासाचार्य ने किया है और दोनों ही शब्दों की आलोचना शङ्कराचार्यजी ने की है, यहाँ थोड़ा दिग्दर्शन करा देना आवश्यक है ---

उभयव्यपदेशात्त्वहि कुण्डलवत्, (ब्र०सू०३/२/२०)

इस सूत्र पर वेदान्त पारिजात वृत्ति देखिये- “विश्वं ब्रह्मणि स्वकारणे भिन्नाभिन्नसम्बन्धेन स्थातु मर्हति।

इसी सूत्र पर श्रीनिवासाचार्य का भाष्य देखा जाय--

कार्यस्य कारणेन ब्रह्मणा सह स्वभाविकौ भेदाभेदौ भवतः। इसी प्रकार ब्र० सू० २/३/४२ के भाष्य में श्रीनिम्बार्क और श्रीनिवासाचार्य ने भेदाभेद का नामोल्लेख किया है। शंकराचार्य ने भी ब्र० सू०२/३/४३ सूत्र के भाष्य में लिखा है--“भेदाभेदा-वगमाभ्यामंशत्वावगमः। यहाँ पर जिस प्रकार भेदाभेद शब्द का प्रयोग किया उसी प्रकार ब्र० स० ३/ २/२१ आदि सूत्रों के भाष्य में द्वैत प्रपञ्च विलयरूप संकेतादि से द्वैताद्वैत नाम का भी उल्लेख किया है। इसके साथ-साथ यह भी देखा जाता है कि जिन-जिन उदाहरणों द्वारा श्रीनिम्बार्क या श्रीनिवासाचार्य ने द्वैताद्वैत एवं भेदाभेद का समर्थन किया है, उन्हीं उदाहरणों सहित श्रीशङ्कराचार्य ने भेदाभेद एवं द्वैताद्वैत का विरोध किया है।

उदाहरण-“यथा लोके मृत्पिण्डोपादानकानां घट शरावादीनां, सुवर्णोपादानकानां कटककुण्डलादीनां समुद्रोपादान-कानां फेनतरंगादीनां, वृक्षोपादानकानां फलपत्रादीनां च कारण-ऽनन्यत्वेपि परस्परं विभागोऽस्ति तथा ब्रह्मोपादानकत्वेन तदनन्य-योरपि भोक्तुभोग्ययोः परस्परं विभागः स्यात्, एवं भोक़ नियन्त्रोरपि अविभागेऽपि विभागः स्यात्, यथा मृदोऽभिन्ना अपि स्वभावतो घटशरावादयो मृद्ध्यतिरिक्तस्थितिप्रवृत्यभावात्, मृदः सकाशाद्भिन्ना अपि स्वभावत एव। ब्र० सू० २/१/१३ का श्रीनिवास (कौस्तुभ) भाष्य। इसकी आलोचना ब्र० सू०२/१/१४ सूत्र के शङ्करभाष्य में इस प्रकार की गई है - नन्वनेकात्मकं ब्रह्म यथा वृक्षोऽनेकशाखः, एवमनेक शक्तिप्रवृत्तियुक्तं ब्रह्म, ब्रह्म अत एकत्वं नानात्वञ्चोभयं सत्यमेव। यथा वृक्ष इति एकत्वं शाखा इति नानात्वं यथा च मृदात्मनैकत्वं घटशरावाद्यात्मना नानात्वम्।

इन सन्दर्भो से स्पष्ट हो जाता है-श्रीशङ्कराचार्य श्रीनिम्बार्क मत की आलोचना की है। ऊपर भेदाभेद के उदाहरण दिये गये हैं। अब श्रीशङ्कराचार्य द्वारा द्वैताद्वैत की आलोचना का उदाहरण लिया जाय ----

अत्रैके वर्णयन्ति एवञ्च द्वैताद्वैताात्मकं एकं ब्रह्म यथा किल समुद्रो तरंगफेन-वुवुदाद्यात्मकः ननु ब्रह्मणो द्वैताद्वैतात्मकत्वे समुद्रादिदृष्टान्ता विद्यन्ते, (इत्यादि पूर्वपक्ष उठाकर..) विरोधाच्च द्वैताद्वैतयोरेकस्य तस्मान्न सुविविक्षितेयं कल्पना, अथाप्यभ्युपगम्य ब्रूमः, द्वैताद्वैतात्मकत्वेऽपिशास्त्र विरोधस्य तुल्यत्वात्। वृहदारण्यक उपनिषत् ५/१/६ का शाङ्करभाष्य।

पाठक स्वयं विचार कर सकते हैं- निम्बार्क का मत द्वैताद्वैत ही है भेदाभेद नहीं, शंकराचार्य ने कहीं भी द्वैताद्वैत की आलोचना नहीं की, यह चक्रजी का कथन सत्य है या निराधार असत्य। प्रायः बहुत से लेखक चक्रजी की भाँति ही चक्कर खा रहे हैं।

यदि श्रीनिम्बार्क और श्रीनिवास शंकराचार्य से पूर्ववर्ती न होते तो शंकराचार्य ने “उत्पत्तिरससम्भवात्' इस ब्रह्मसूत्र के भाष्य में जो नारद पंचरात्र का खंडन किया है उसकी आलोचना वे अवश्य करते जैसे परवर्ती सभी वैष्णव भाष्यकार आचार्यों ने की है।

शंकराचार्य से श्रीनिम्बार्क को पूर्ववर्ती होने में एक प्रमाण और भी है - श्रीभाष्करभट्ट और शङ्कराचार्य को (राजेन्द्र घोष आदि) बहुत से लेखक समसामयिक मानते हैं, उन्होंने जो ब्रह्मसूत्रों का भाष्य किया है। उसके सम्बन्ध में प्रतिज्ञा की है--मैं यह भाष्य मायावादियों के भाष्य का खण्डन करने के लिये ही लिख रहा हूँ-भट्टभाष्कर ने शङ्कर के साथ-साथ श्रीनिवास के वेदान्तकौस्तुभ की कई स्थलों पर आलोचना की है-- नित्योपलब्ध्यनुपल० ब्र० सू० २/३/३१ के भाष्य में श्रीनिवासाचार्य ने लिखा है-चेतनभूता-त्मविभूत्ववादिमते दोष कथनार्थ सूत्रम्, भाष्करभट्ट के अनुसार उपर्युक्त सूत्र की सं० २/३/३२ है, श्रीभाष्करभट्ट ने इस सूत्र का प्रयोजन बौद्धों का निराकरण बतलाया है और जिन भाष्यकारों ने चेतन आत्मा को विभु मानने वाले वादियों के मत में दोष देने के लिए यह सूत्र बतलाया है उनका खण्डन किया है उनकी वह पंक्ति श्रीनिवासाचार्य की पंक्ति से अक्षरशः मिलती है--

यत्पुनरात्म विभुत्व वादिमते दोषकथनार्थ सूत्रमिति व्याख्यातं तदयुक्तम् ।' आज जितने भी भाष्य मिलते हैं किसी भी भाष्यकार की ऐसी अक्षर योजना नहीं मिलती केवल श्रीनिवासाचार्य और भाष्कर भाष्य की पंक्तियों में ही यह मिलान होता है, इससे स्पष्ट हो जाता है कि श्रीनिवासाचार्य भास्करभट्ट और तत्समसामयिक श्रीशङ्कराचार्य से पूर्ववर्ती थे।

भाष्कराचार्य का एक उदाहरण और भी देखना चाहिये, सभी भाष्यकारों के मत से ब्रह्मसूत्रों की संख्या में भेद है। श्रीनिम्बार्क का अभिमत एक सूत्र है--

अतएव च तद्ब्रह्म० ब्र० सू०१/२/१५ शङ्कराचार्य इस सूत्र का उल्लेख नहीं करते, रामानुजाचार्य उल्लेख करते हैं किन्तु उनके भाष्य में सूत्र का पाठ“अतएव च स ब्रह्म है। इस सूत्र के सम्बन्ध में भाष्कराचार्य लिखते हैं --अत्रावसरे अतएव च तद्ब्रह्मेति सूत्रमन्ये पठन्ति तत्पुनर्गतार्थतार्थमित्यन्यैर्नाभि-धीयते' (भाष्कर भाष्य १/१/१४) भाष्कराचार्य की यह आलोचना केवल श्रीनिम्बार्क भाष्य और शङ्कर भाष्य का संकेत करती है, उनका कहना है हमसे दूसरे भाष्यकार ऐसा सूत्र मानते हैं, अर्थात् श्रीनिवास श्रीनिम्बार्क ऐसा सूत्र मानते हैं, रामानुज की ओर तो वे संकेत करते नहीं क्योंकि रामानुज भट्ट भाष्कर से परवर्ती हैं, बोधायन आदि का संकेत समझें तो उनका पाठ भिन्न है रामानुज भाष्य में ‘स ब्रह्म' ऐसा पाठ है। दूसरे अन्य शब्द से भाष्कराचार्य ने शङ्कराचार्य का संकेत किया है क्योंकि शङ्कराचार्य ने इस सूत्र की चर्चा नहीं की। अस्तु ।

श्रीभाण्डारकर ने जो पीढियों की १८ वर्ष की औसत लगाकर श्रीनिम्बार्क से समय का अनुमान लगया था वह औसत भी ठीक नहीं क्योंकि अन्य सम्प्रदायों में गृहस्थाश्रम भोग के अनन्तर भी सन्यास लेकर आचार्य सिंहासनारूढ हो जाते हैं। परन्तु श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के आचार्य सिंहासन पर नैष्ठिक बाल ब्रह्मचारी ही आरूढ हो सकते हैं। अतः उनका पट्टोपभोगकाल अन्य आचार्यों की अपेक्षा अधिक होता है, उदाहरणार्थश्रीनिम्बार्काचार्यपीठ पर विक्रम संवत् १६७० सं २००० तक ३३० वर्षों में श्रीहरिवंशदेवाचार्यजी से लगाकर श्रीबालकृष्ण-शरणदेवाचार्यजी तक १० पीठिका हुई उनका ३३ वर्ष प्रतिपीठिका औसत लगता है। उनका समय इस प्रकार है--

श्रीहरिवंशदेवाचार्यजी वि० सं० १६७० से १७१३

श्रीनारायणदेवाचार्यजी वि० सं० १७१४ से १७५५

श्रीवृन्दावनदेवाचार्यजी वि० सं० १७५५ से १७६७

श्रीगोविन्ददेवाचार्यजी वि० सं० १७९७ से १८१४

श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १८१४ से १८४१

श्रीसर्वेश्वरशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १८४१ से १८७०

श्रीनिम्बार्कशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १८७० से १८१८

श्रीव्रजराजशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १८९४ से १९००

श्रीगोपीश्वरशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १९०० से १९२८

श्रीघनश्यामशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १९२८ १९६३

श्रीबालकृष्णशरणदेवाचार्यजी वि० सं० १९६३ से २०००

उपर्युक्त आचार्यों का पट्टोप भोगकाल २-३ को छोड़कर अन्य सभी का ३७-४०,४२-४३ वर्षों तक रहा है। पूर्ववर्ती आचार्य तो और भी दीर्घायु होते थे जब साधारण जन भी शतायु हुआ करते थे तब नैष्ठिक ब्रह्मचारी के दीर्घायु होने में किसी प्रकार का सन्देह ही नहीं रहता। कदाचित् इसी औसत के अनुसार भी लगालें तो श्रीहरिवंशदेवाचार्यजी ३३ वें पीठिका पूर्व श्रीनिम्बार्काचार्य हैं, अतः ३३४३३=१०२९ वर्ष होते हैं। श्रीहरिवंशदेवा-चार्यजी (वि० सं० १६७०) से १०२९ वर्ष पूर्व श्रीनिम्बार्काचार्य का समय निश्चित हो सकता है। इस औसत के अनुमान से भी वि० सं० ६४१ से पूर्व श्रीनिम्बार्काचार्य का समय सिद्ध होता है।
यद्यपि ये सब अनुमान हैं, इन सबसे श्रीनिम्बार्काचार्य का समय निश्चित होना कठिन है, तथापि श्रीभाण्डारकर और उनके अभिमत का समर्थन करने वालों की सब तर्के समाप्त हो जाती हैं। श्री आदि शंकराचार्य जी का समय ईसा पूर्व ५ वीं शताब्दी निश्चित हैं। भाष्यों के प्रमाण से यह सिद्ध हैं की श्रीनिम्बार्काचार्य श्री आदि शंकराचार्य जी से पूर्व हुए हैं। इस प्रकार श्रीनिम्बार्काचार्य का समय ढाई हजार वर्ष पूर्व सिद्ध होता हैं जो अधिक अन्वेषण से पुष्ट होने पर द्वापरान्त में श्रीनिम्बार्क का समय प्रमाणित हो जाता है। इन्हीं आधारों से नवीन लेखकों में भी बहुत से लेखकों ने श्रीभाण्डारकर के विपरीत लिखा है। डा० श्रीनारायणदत्त शर्मा मथुरा का कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के हिन्दी कवि', डा० अमरप्रसाद भट्टाचार्य कलकत्ता का “श्रीनिम्बार्क व द्वैताद्वैत दर्शन', डा० श्री रामप्रसाद शर्मा किशनगढ का “श्रीपरशुरामदेवाचार्य और उनकी रचनायें आदि शोध प्रबन्ध दृष्टव्य हैं।

पाश्चात्य लेखकों में डा० मोनियर विलियम्स, हैस्टिंग्स साहब, ग्रीयर्सन ग्राउस साहब का मथुरा मैमोरियल देखना चाहिये। अहमदाबाद के एक पादरी और हॅटर साहब भी श्रीनिम्बार्क की प्राचीनता का ही समर्थन करते हैं।

लेखक -

अधिकारी पंडित श्रीव्रजवल्लभशरण जी
वेदान्ताचार्य - पंचतीर्थ
श्रीनिकुञ्ज, वृन्दावन

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर ।
    आज मैं भी इसी विषय का अध्ययन कर रहा था ।
    श्री श्रीश्री 108 श्री धनञ्जय दास काठिया बाबा जी महाराज रचित "निम्बार्क वेदांत का संक्षिप्त सार "

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