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शनिवार, 17 नवंबर 2018

श्रीहंस भगवान्, श्रीसर्वेश्वर प्रभु एवं श्रीसनकादिक महर्षि गण प्राकट्य महोत्सव की मङ्गल बधाई



"हंसस्वरूपं रुचिरं विधाय, य: सम्प्रदायस्य प्रवर्तनार्थम्।
स्वतत्त्वमाख्यत्सनकादिकेभ्यो, नारायणं तं शरणं प्रपद्ये ।"

अनंतकोटी-ब्रह्मांड नायक, करुणा-वरुणालय, सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार श्रीहरि के मुख्य 24 अवतारों में श्रीहंस भगवान् भी एक अवतार हैं। आपका प्राकट्य सत्ययुग के प्रारम्भ काल में युगादि तिथि कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय नवमी) को हुआ है। आपके अवतार का मुख्य प्रयोजन यही मान्य है कि एक बार श्रीसनकादि महर्षियों ने पितामह श्री ब्रह्मा जी महाराज से प्रश्न किया कि -

गुणेष्वाविशते चेतो गुणांश्चेतसि च प्रभो ।
कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितिर्षो: ।।।
पितामह ! जबकि चित्त विषयों की ओर स्वभाव: जाता है और चित्त के भीतर ही वासना रूप से विषय उत्पन्न होते हैं, तब मुमुक्षुजन उस चित्त और विषयों का परित्याग कैसे करें ?

यह चित्तवृत्ति-निरोधात्मक गम्भीर प्रश्न जब ब्रह्माजी के समझ में नहीं आया तब महादेव ब्रह्मा ने भगवान श्रीहरि का ध्यान किया। इस प्रकार ब्रह्माजी की विनीत प्रार्थना पर “ऊर्जे सिते नवम्यां वै हंसो जात: स्वयं हरि " कार्तिक शुक्ला नवमी को स्वयं भगवान् श्रीहरि ने हंसरूप में अवतार लिया । भगवान् ने हंसरूप इसलिए धारण किया कि जिस प्रकार हंस नीर-क्षीर (जल और दूध) को पृथक् करने में समर्थ है, उसी प्रकार आपने भी नीर-क्षीर विभागवत् चित्त और गुणत्रय का पूर्ण विवेचन कर परमोत्कृष्ट दिव्य तत्व साथ-साथ पंचपदी ब्रह्मविद्या श्री मंत्र का सनकादि महर्षियों को सदुपदेश कर उनके संदेह की निवृत्ति की । यह प्रसङ्ग श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध अध्याय 13 में श्रीकृष्णोद्धव संवादरूप से विस्तारपूर्वक वर्णित है।

भगवत्परायण, बाल-बह्मचारी, सिद्धजन, तपोमूर्ति ये चारों भ्राता सृष्टिकर्ता श्री ब्रह्मदेव के मानस पुत्र हैं। इन चारों के नाम हैं-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार। इनके उत्पन्न होते ही श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि विस्तार की आज्ञा दी, पर इन्होंने प्रवृत्ति मार्ग को बंधन जानकर परम श्रेष्ठ निवृत्ति मार्ग को ही ग्रहण किया। श्री सनकादि मुनिजन निवृति धर्म एवं मोक्ष मार्ग के प्रधान आचार्य हैं। पूर्वजों के पूर्वज होते हुये भी ये पाँच वर्ष की अवस्था में रहकर भगवद्भजन में ही संलग्न रहते हैं।
श्रीहंस भगवान ने कार्तिक शुक्ल नवमी को श्री सनकादि महर्षियों की जिज्ञासा पूर्ति कर उन्हें श्रीगोपाल तापिनी उपनिषद के परम दिव्य पंचपदी विद्यात्मक श्रीगोपाल मन्त्रराज का गूढतम उपदेश तथा अपने निज स्वरुप सूक्ष्म दक्षिणावर्ती चक्राङ्कित शालिग्राम अर्चा विग्रह प्रदान किये जो श्रीसर्वेश्वर के नाम से व्यवहृत हैं। श्रीसर्वेश्वर प्रभु इन्हीं के संसेव्य ठाकुरजी है।

श्री सनकादिक संसेव्य श्रीसर्वेश्वर भगवान् गुञ्जाफल सदृश अति सूक्ष्म श्री शालिग्राम श्रीविग्रह हैं। इसके चारों ओर गोलाकार दक्षिणावर्तचक्र और किरणें बड़ी ही तेज पूर्ण एवं मनोहर प्रतीत होती हैं। मध्य भाग में एक बिन्दु है और उस बिन्दु के मध्य भाग में युगल सरकार श्रीराधाकृष्ण के सूक्ष्म दर्शन स्वरूप दो बड़ी रेखायें हैं। यह श्रीसर्वेश्वर भगवान् की प्रतिमा श्रीसनकादिकों ने देवर्षि श्रीनारदजी को प्रदान की थी और श्रीनारद जी ने भगवान श्री निम्बार्क महामुनीन्द्र को । इस तरह यह श्रीसर्वेश्वर भगवान शालिग्राम प्रतिमा क्रमशः परम्परागत अद्यावधि अ.भा. श्री निम्बार्काचार्य पीठ, निम्बार्कतीर्थ में विराजमान है। जब श्रीआचार्यचरण धर्म-प्रचारार्थ अथवा भक्तजनों के परमाग्रह पर यत्र-तत्र पधारते हैं, तब, यही श्रीसर्वेश्वर प्रभु की सेवा साथ रहती श्रीसर्वेश्वर प्रभु श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के परमोपास्य इष्टदेव हैं।



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